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मध्य पूर्व में जंग की आहट: क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडरा रहा है खतरा? जानिए तेल भंडार, कीमतों और सरकार के ‘प्लान बी’ की पूरी तस्वीर

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मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की धड़कनें तेज कर दी हैं। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ जैसे सैन्य अभियानों और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों ने कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक भारत इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल को बेहद गंभीरता से देख रहा है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है और उसमें भी आधे से अधिक की निर्भरता मध्य पूर्व पर है। ऐसे में सवाल उठता है—अगर हालात बिगड़ते हैं तो क्या भारत के पास पर्याप्त तैयारी है?
सबसे पहले बात करते हैं भंडार की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों—जैसे पेट्रोल और डीजल—का लगभग 25 से 45 दिनों का स्टॉक उपलब्ध है। एलपीजी का भंडार भी करीब 25 से 30 दिनों तक की मांग पूरी कर सकता है। यदि वाणिज्यिक भंडार, रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और समुद्र में भारत की ओर आ रहे टैंकरों को जोड़ दिया जाए, तो कुल उपलब्धता लगभग 70 से 75 दिनों तक की जरूरत पूरी कर सकती है। इसका मतलब है कि अचानक आपूर्ति रुकने की स्थिति में देश के पास तत्काल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन लंबी अवधि का संकट चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सबसे बड़ी चिंता का केंद्र है होर्मुज जलडमरूमध्य। यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है। भारत का करीब 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है, साथ ही कतर से आयातित एलएनजी भी इसी मार्ग पर निर्भर है। यदि यह जलमार्ग बाधित होता है तो शुरुआती झटका सप्लाई से ज्यादा कीमतों पर दिखेगा। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड पहले ही 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। ऐसे में बीमा प्रीमियम, माल ढुलाई लागत और वैकल्पिक मार्गों की लंबी दूरी कीमतों को और ऊपर ले जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति अस्थायी रूप से भी रुकती है, तो भारत को रसद और परिवहन में तत्काल दबाव झेलना पड़ सकता है। हालांकि रिफाइनरी कंपनियां आम तौर पर वाणिज्यिक भंडार बनाए रखती हैं, जिससे कुछ समय तक स्थिति संभाली जा सकती है। जरूरत पड़ने पर जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे ‘केप ऑफ गुड होप’ जैसे वैकल्पिक मार्गों से मोड़ा जा सकता है, लेकिन इससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे।
चीन की तुलना में भारत की संवेदनशीलता अधिक मानी जा रही है। बताया जाता है कि चीन के पास छह महीने तक की जरूरत के बराबर कच्चा तेल रिजर्व है, जबकि भारत की रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडारण क्षमता उससे काफी कम है। इसका अर्थ यह है कि अगर संकट लंबा खिंचता है, तो भारत पर आर्थिक दबाव अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ेगा—खासतौर पर चालू खाता घाटा, महंगाई और रुपये की स्थिरता पर।
सरकार की तैयारी बहुस्तरीय है। पेट्रोलियम मंत्रालय पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अमेरिका से अतिरिक्त आपूर्ति के विकल्प तलाश रहा है। रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने की रणनीति भी खुली रखी गई है। इसके अलावा भारत डीजल और जेट ईंधन का बड़ा निर्यातक है; आपात स्थिति में सरकार इन उत्पादों के निर्यात पर अस्थायी रोक लगाकर घरेलू बाजार को प्राथमिकता दे सकती है।
जहां तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों का सवाल है, फिलहाल सरकार ने तत्काल मूल्यवृद्धि से इनकार किया है। मंत्रालयों के स्तर पर लगातार निगरानी की जा रही है ताकि बाजार में घबराहट न फैले और आपूर्ति सामान्य बनी रहे। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर बाद में खुदरा कीमतों पर दिख सकता है।
कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि भारत तत्काल संकट से निपटने की स्थिति में है, परंतु लंबी अवधि की जंग या होर्मुज में अवरोध देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है। रणनीतिक भंडार, आपूर्तिकर्ताओं में विविधता और निर्यात नियंत्रण जैसे उपाय फिलहाल सुरक्षा कवच का काम कर रहे हैं। फिर भी मध्य पूर्व की हर हलचल पर नई दिल्ली की पैनी नजर बनी हुई है, क्योंकि वैश्विक तेल बाजार में उठी एक लहर भी भारत की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर डाल सकती 

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